गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

गर्भाधान संस्कार ,हिन्दू धर्म मे संतान के जन्म की योजना एक शुभ गुणो से युक्त स्वस्थ संतान के लिए

                                                   ॐ श्री महा गणेशाय नमः

हिन्दू धर्म मे मनुष्यों के 48 संस्कार हैं जिनमे से 16 संस्कार विशेष आचरनीय हैं । वेदिक काल मे मनुष्य सभी 48 संस्कारों से संस्कृत होता था । किन्तु वर्तमान मे 16 संस्कार भी लुप्त होते जा रहे हैं । तब भी धर्म प्राण देश के लिए प्रमुख 16 संस्कार मुख्य हैं । जिनके किए जाने से मनुष्य सभी क्रियाकर्म करने का अधिकारी होता है । सबसे पहले
गर्भाधान संस्कार जिसके भी नियम और मुहूर्त हैं हिन्दू धर्म मे संतान भी एक पवित्र कार्य है जिसकी योजना जरूरी है यदि हम अपनी संतान से दुखी हैं तो इसका कारण भी हम ही है । यदि अच्छी संतान की इच्छा है तो गर्भाधान संस्कार को एक अनुष्ठान की तरह कीजिये इन नियमो के अनुसार -


राजस्वला का स्नान मुहूर्त :-
 हस्त,स्वाती,अश्विनी,मृगशिरा,अनुराधा,धनिष्ठा,ध्रुवसंज्ञक,और ज्येश्ठा नक्षत्रो मे ( भद्रा,निद्रा,संक्रम इत्यादि वर्जित अशुभ समय ) शुभ ग्रहो के वारों मे राजस्वला का स्नान मुहूर्त शुभ कहा गया है । शीघ्र गर्भ धारण के लिए मूल,रेवती,हस्त,अश्विनी,व रोहिणी नक्षत्रों के दिन मे राजस्वला स्नान के लिए मुहूर्त उत्तम है ।

रजोस्नान के अनंतर गर्भाधान मुहूर्त :-
 अपनी धर्म पत्नी के साथ संतान प्राप्ति की इच्छा से स्त्री प्रसंग मे तीन प्रकार के गंडान्त (विवाह प्रकरण) हैं सातवी वधतारा , जन्म नक्षत्र,मूल,भरिणी,अश्विनी,रेवती,मघा,ग्रहण का दिन,व्यतीपात,वैधृतीयोग,माता-पिता का श्राद्ध दिन,सूर्योदयात्सूर्यास्त तक दिन मे ( संध्याकाल और मध्यरात्री भी ) ,परिधी भोग का पूरवार्ध,दिव्यांतरिक्षभौम से उत्पन्न त्रिविध उत्पातों से दुसधित दिन,जन्म लग्न और जन्म राशी से अष्टम राशी जन्मलग्न और पाप गृह से युक्त राशी या नक्षत्र का परित्याग करना चाहिए । 

गर्भाधान मुहूर्त के संबंध मे और ज्ञातव्य:-
 भद्रा,षष्ठी पर्व के दिन,चतुर्दशी,अष्टमी,अमावस्या,पूर्णिमा,रिक्ता तिथियाँ,प्रातः और साँय संध्या,भोम,सूर्य और शनिवार रजोदर्शन दिन से आगे तक के चार दिन,ये सब गर्भाधान मे त्याज्य हैं । पुत्रार्थी के लिए रजोदर्शन से आगे के विषम दिन भी गर्भाधान के लिए त्याज्य हैं ।

तीनों उत्तरा,मृगशिरा,हस्त,अनुराधा,रोहिणी,स्वाती,श्रवण,धनिष्ठा,और सतभिषा नक्षत्रो मे गर्भाधान शुभ कहा गया है । गर्भाधान मे पुत्रार्थी के लिए पुरुष गृह (सूर्य ,भोम,गुरु ) और कन्यार्थी के लिए स्त्री गृह के वार शुभ कहे गए हैं । नपुंसक वार के दिन के गर्भाधान से संतान नपुंसक या शक्तिहीन होने का योग रहता है । अतः गर्भाधान मे बुध और शनिवार का भी निषेध है । अशुभ ( क्रूर ) ग्रहों मे सूर्य और भोम भी ग्रहीत हैं ।

रजस्वला स्त्री का स्वरूप प्रथमदिन मे चांडाली ,द्वितीय दिन मे ब्रह्मघातिनी,तृतीय दिन राज की कटी जाने से वह चौथे दिन ही पति के लिए ( जल स्पर्शादि ) शुद्ध काही गई है । देव व पितृ कार्यों मे वह पांचवे दिन शुद्ध व शुभ मानी गई है ।

रजोदर्शन के बाद 16 दिनो के भीतर समदिनों का गर्भाधान पुत्रप्राप्तिपद और विषम दिनो का गर्भाधान कन्या प्राप्ति के लिए कहा गया है । उसके पश्चात द्वितीय रजोदर्शन तक स्त्री प्रसंग अहेतुक अर्थात काम त्रिपत्यर्थ हो जाता है । आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का भी यही मूल सिद्धान्त है ।

गर्भाधान मे लग्न शुद्धी:-
 (1/4/7/10/5/9/)केंद्र तरीकों मे शुभ गृह हों ,3,6,11 मे पाप गृह हों पुरुष गृह ( सूर्य,मंगल,गुरु ) लग्न को देखते हों एसे लगनों के विषम राशी के नवांश मे चंद्रमा की स्तिथी हो , रजोदर्शन मे सम रात्रियों ( 6/8/10/12/14/16/) एम चित्रा,पुनर्वसु,पुष्य और अश्विनी मे से कोई भी नक्षत्र हो तो गर्भाधान निश्चयमेव शुभतम होता है ।  

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